दमोह सवाल पूछना गुनाह है क्या? दमोह में पत्रकार से धक्का-मुक्की पर उठे लोकतंत्र पर सवाल?

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सवाल पूछना गुनाह है क्या? दमोह में पत्रकार से धक्का-मुक्की पर उठे लोकतंत्र पर सवाल?

विशेष टिप्पणी

मध्यप्रदेश के दमोह जिले में आयोजित एक सरकारी प्रेस वार्ता अब लोकतंत्र, पत्रकारिता और सत्ता के व्यवहार पर बड़ा सवाल बन चुकी है। शासन द्वारा आयोजित इस प्रेस वार्ता में जिले के प्रभारी मंत्री इंदर सिंह परमार, विधायक जयंत मलैया, मंत्री धर्मेंद्र सिंह लोधी, सांसद राहुल सिंह लोधी सहित कई जनप्रतिनिधि और अधिकारी मौजूद थे। लेकिन यह प्रेस वार्ता उस समय विवाद में आ गई जब पत्रकार अरुण मिश्रा ने इंधन बचत और सरकारी काफिलों को लेकर सवाल पूछ लिया।

बताया गया कि पत्रकार द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील का हवाला देते हुए पूछा गया कि जब देश में ईंधन बचाने की बात हो रही है, तब मंत्रीजी के काफिले में दर्जनों गाड़ियां क्यों चल रही हैं? इसी सवाल पर प्रभारी मंत्री इंदर सिंह परमार कथित रूप से भड़क गए और पत्रकार को धक्का दे दिया। घटना के बाद पत्रकार जगत में भारी आक्रोश है।

अब सवाल यह उठता है कि क्या सरकारी प्रेस वार्ता केवल प्रशंसा सुनने के लिए होती है? यदि पत्रकार जनहित से जुड़े सवाल पूछे तो क्या वह सत्ता की नजर में अपराधी बन जाता है? यदि प्रेस वार्ता में वही सवाल पूछे जाएंगे जो मंत्री या अधिकारी सुनना चाहते हैं, तो फिर लोकतंत्र और पत्रकारिता का अर्थ ही क्या रह जाएगा?

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाने वाली पत्रकारिता का काम सत्ता से सवाल पूछना है, न कि केवल तालियां बजाना। पत्रकार यदि जनता की समस्याओं, सरकारी खर्च, कर्मचारियों के वेतन और सरकारी नीतियों पर सवाल पूछेगा ही नहीं, तो फिर जनता की आवाज कौन उठाएगा?

घटना के दौरान यह भी मुद्दा उठा कि कई विभागों में कर्मचारियों को महीनों से वेतन नहीं मिला है। ग्राम पंचायत, जनपद पंचायत, स्वास्थ्य विभाग, नगर पालिका और अन्य विभागों के कर्मचारी समय पर वेतन के लिए परेशान हैं। दूसरी तरफ सरकार योजनाओं के प्रचार में करोड़ों खर्च कर रही है। ऐसे में पत्रकार द्वारा सवाल पूछना स्वाभाविक था। लेकिन जवाब देने के बजाय यदि धक्का-मुक्की की जाए, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक संकेत है।

विडंबना यह भी है कि मंचों से अक्सर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतंत्र की बातें की जाती हैं, लेकिन जमीन पर सवाल पूछने वाले पत्रकारों को अपमानित किया जाता है। इससे पहले भी दमोह में पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार और दबाव के आरोप लग चुके हैं। यही कारण है कि अब पत्रकारों में असंतोष बढ़ता जा रहा है।

पत्रकारों का कहना है कि यदि प्रेस वार्ता में अपमानित ही होना है, तो फिर ऐसी सरकारी बैठकों का बहिष्कार किया जाएगा। क्योंकि पत्रकारिता किसी नेता की पीआर एजेंसी नहीं, बल्कि जनता और सत्ता के बीच जवाबदेही का माध्यम है।

अब निगाहें मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव पर टिकी हैं कि क्या वे इस मामले का संज्ञान लेकर निष्पक्ष जांच करवाएंगे, या फिर हमेशा की तरह मामला ठंडे बस्ते में चला जाएगा। लोकतंत्र में सत्ता की ताकत बड़ी हो सकती है, लेकिन सवाल पूछने का अधिकार उससे भी बड़ा माना गया है। यदि वही अधिकार दबाया जाने लगे, तो फिर लोकतंत्र केवल भाषणों में ही बचता है।

आज जरूरत इस बात की है कि सत्ता यह समझे कि पत्रकार सवाल पूछेगा, क्योंकि वही उसका धर्म है। अगर सवालों से डर लगने लगे, तो फिर प्रेस वार्ता नहीं, केवल प्रचार सभा बचती है।

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