आजादी के 78-79 साल बाद भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित बंडा गांव डबल इंजन सरकार के दावे जमीनी हकीकत में फेल

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आजादी के 78-79 साल बाद भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित बंडा गांव
डबल इंजन सरकार के दावे जमीनी हकीकत में फेल
स्थान: पखांजूर, जिला कांकेर (छत्तीसगढ़)
संवाददाता: तनुज सरकार
कांकेर जिले के पखांजूर क्षेत्र से एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है, जहां आजादी के 78-79 साल बाद भी एक गांव सरकारी मूलभूत सुविधाओं से पूरी तरह वंचित है।
कोयलीबेड़ा ब्लॉक अंतर्गत ग्राम पंचायत इरूकबुट्टा के आश्रित ग्राम बंडा में आज भी विकास की रोशनी नहीं पहुंच सकी है। लगभग 27-28 परिवारों और 70-80 की आबादी वाला यह गांव आज भी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहा है।
ग्रामीणों के अनुसार, गांव में आज तक बिजली नहीं पहुंची है, जिससे लोग अंधेरे में जीवन बिताने को मजबूर हैं। पीने के पानी के लिए ग्रामीण आज भी झरिया (प्राकृतिक स्रोत) पर निर्भर हैं, चाहे बरसात हो, कड़ाके की ठंड या भीषण गर्मी।
शिक्षा व्यवस्था की बात करें तो गांव में न तो स्कूल है और न ही आंगनबाड़ी केंद्र। इससे छोटे बच्चों का भविष्य अंधकार में जाता दिख रहा है। स्वास्थ्य सुविधाएं भी नदारद हैं, जिससे बीमार होने पर ग्रामीणों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
राशन जैसी जरूरी सुविधा के लिए भी ग्रामीणों को करीब 4 किलोमीटर पैदल पगडंडी का सफर तय करना पड़ता है। इतना ही नहीं, गांव तक पहुंचने के लिए कोई सड़क नहीं है—लोग केवल पगडंडी या साइकिल के सहारे गांव तक पहुंचते हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार जनप्रतिनिधियों—विधायक और सांसद—से गुहार लगाई, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन ही मिला।
एक ओर जहां केंद्र सरकार “अमृतकाल” का दावा कर रही है और राज्य सरकार विकास के बड़े-बड़े वादे कर रही है, वहीं बंडा गांव की यह स्थिति इन दावों की जमीनी सच्चाई को उजागर करती है।
अब सवाल यह है कि इस खबर के सामने आने के बाद क्या प्रशासन और जनप्रतिनिधि जागेंगे? क्या बंडा गांव तक बिजली, पानी और सड़क पहुंचेगी? या फिर ग्रामीणों को यूं ही मायूसी में जीवन बिताना पड़ेगा?

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