जब नौलखी में भगवान मुस्कुरा रहे थे… और भक्त रो रहे थे…सुरों में वृंदावन था, भावों में जगन्नाथपुरी
देवेन्द्र रघुवंशी, गंजबासौदा। कभी-कभी भजन कानों से नहीं, आत्मा से सुने जाते हैं। मंगलवार की वह रात भी ऐसी ही थी। किसी की पलकों पर अश्रु थे, किसी के दोनों हाथ आकाश की ओर उठे थे। कोई आंखें मूंदे अपने कन्हैया को खोज रहा था, तो कोई महाप्रभु जगन्नाथ के विशाल नेत्रों में अपना जीवन सौंप रहा था। मंदिर में बैठे लोग सुन नहीं रहे थे… वे अपने भीतर उतर रहे थे। हारमोनियम पर जैसे ही भक्ति में सधे साधक ब्रजराज की उंगलियां थिरकीं और सुर निकले तो किसी को वृंदावन की कुंज गलियां याद आ गईं, किसी को बरसाने की होली दिखाई देने लगी, तो कोई महाप्रभु श्रीजगन्नाथ की नगरी पुरी के दिव्य दर्शन में खो गया। भजन संध्या के अंतिम पल में नगर के शास्त्रीय संगीत के प्रसिद्ध युवा गायक शुभांशु झा की अष्टपदी ने भक्ति के उन्माद को शांति में बदल दिया। उनका मंद स्वर ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो मोसी महाप्रभु श्रीजगन्नाथ को प्रेमपूर्वक विश्राम के लिए ममता भरी लोरी सुना रही हो…और गीत के बोल मंद-मंद पडते ही महाप्रभु की पलकों पर स्वयं भक्ति नींद बनकर उतर आई हो।
मंगलवार की रात नौलखी मंदिर की छत के नीचे भक्त और भगवान थे, लेकिन छत के ऊपर पूरा ब्रह्मांड जाग रहा था। तारे गायब थे, काले बादल पहरेदार बनकर खड़े थे। बूंदें धीरे-धीरे धरती को चूम रही थीं। बिजली हर कुछ क्षण में आकाश पर स्वर्णिम रेखा खींच देती और इन सबके बीच ब्रजराज की स्वर साधना से जब पुकार उठी, तो लगा मानो वृंदावन की गोपियां फिर से अपने श्याम को बुला रही हों और सदियों का विरह एक ही पल में पिघलकर आंखों से बह निकला हो। कंठ में भाव सधे थे, आंखों से प्रेम अश्रुधारा बह रही थी। उस भीड़ में भक्ति के भाव में कोई सिसक उठा, कोई मुस्कुरा दिया, कोई मंदिर के एक कोने में चुपचाप रोता रहा। स्वर में भाव प्रवाह ऐसा था मानो किसी ने वृंदावन का द्वार खोल दिया हो और बरसाना मुस्कुरा रहा हो। सुरीले कंठ से हृदय के भाव गूंजे तो लगा जगन्नाथपुरी अपने प्रभु सहित नौलखी में विराजमान थी।
श्रीजगन्नाथ रथ यात्रा महोत्सव के उपलक्ष्य में मंगलवार रात्रि श्री नौलखी मंदिर में आयोजित नगर के बृजराज अग्रवाल (ब्रज), दीपक ताम्रकार भोपाल की टीम की प्रस्तुति ऐसी आध्यात्मिक अनुभूति बन गई जिसमें श्रद्धालुओं को लगा…. मानो नौलखी मंदिर का आंगन ही वृंदावन, बरसाना और श्रीजगन्नाथ पुरी में बदल गया हो। देर रात तक गूंजते भजनों, सुर, संगीत और भक्तों की भाव-विभोर उपस्थिति ने पूरे वातावरण को कृष्णमय बना दिया। बृज अग्रवाल ने स्वर्गीय विनोद अग्रवाल की चिर-परिचित भावपूर्ण शैली की छाप के साथ भजनों को केवल स्वर नहीं दिए, बल्कि भजनों के बीच-बीच में उनमें छिपे आध्यात्मिक संदेश की उपस्थिति देकर उसे जीवंत कर दिया।
उनकी गायकी में स्वर्गीय विनोद अग्रवाल की वही आत्मीयता, वही माधुर्य और वही भक्ति की मिठास झलक रही थी। हर भजन के साथ लगता था कि नौलखी मंदिर की चौखट से निकलकर श्रद्धालु कभी यमुना तट पहुंच जाते हैं, कभी बरसाना की गलियों में राधारानी का स्मरण करने लगते हैं, तो कभी महाप्रभु श्रीजगन्नाथ की पुरी में खड़े होकर उनके विशाल नेत्रों में अपना जीवन पढ़ने लगते हैं। भजन संध्या आगे बढ़ी तो एक के बाद एक ऐसी प्रस्तुतियां हुईं, जिन्होंने श्रद्धालुओं को भक्ति के अलग-अलग रंगों में डुबो दिया। कभी “गोपाल सांवरिया मेरे…” के भाव में भक्त अपने आराध्य का नाम जपते हुए आत्मिक शांति का अनुभव कर रहे थे। कभी “हे स्वामिनी अभिलाष यही…” की विनम्र प्रार्थना में हर हृदय राधारानी की कृपा और वृंदावन की कुंजों में स्थान पाने की कामना कर रहा था। “गोविंद मेरो है, गोपाल मेरो है…” ने पूरे मंदिर को कृष्णमय बना दिया, तो “किससे नजर मिलाऊं तुम्हें देखने के बाद…” ने श्रद्धालुओं को प्रभु के दिव्य स्वरूप के प्रेम में डुबो दिया। “अब तो आजा प्रभु दो घड़ी के लिए…” की पुकार में भक्त की तड़प छलक रही थी, जबकि “मोहन तेरी गली में मेरा दिल खो गया…” गूंजते ही ऐसा लगा मानो हर भक्त अपने मन को वृंदावन की गलियों में छोड़ आया हो।
और फिर जाते-जाते जैसे ही बृज अग्रवाल ने अपने मधुर कंठ से #जगन्नाथ #चका #नैन… चका नैन… तू..ना.. संभाले तो हमें #कौन #संभाले…” का आलाप छेड़ते ही “जय जगन्नाथ” के जयघोष से मंदिर परिसर गूंज उठा। भजन संध्या में उपस्थित शायद ही कोई ऐसा श्रद्धालु रहा हो, जो अपने कदमों को थिरकने से रोक पाया हो। कोई हाथ उठाकर नृत्य कर रहा था, कोई तालियों की लय में झूम रहा था, #ब्रजराज अकेले नहीं गा रहे थे… पूरा नौलखी मंदिर उनके साथ गा रहा था। कोई स्वर से, कोई आंसुओं से, कोई तालियों से और कोई अपने मौन से।
#बाहर #आसमान #से #मेघ #गर्जना और #मंदिर #में #भक्ति #की #बारिश
भजन संध्या में मौसम बार बार बदला रहा था, लेकिन मन एकचित्त था, आनंदित था। जहाँ बाहर बादलों की बूंदें तन को भिगो रही थीं, तो मंदिर के भीतर उमड़ते भजनों ने मन को तरबतर कर दिया। प्रकृति अपनी फुहारों से धरती का अभिषेक कर रही थी और महाप्रभु श्रीजगन्नाथ अपने भक्तों के हृदयों का। भक्तों के भाव को देखकर लगा बाहर मेघ बरस रहे थे, भीतर आंखें। दोनों ही वर्षाएं पवित्र थीं, एक आकाश से उतर रही थी, दूसरी आत्मा की गहराइयों से। रात गहराती जा रही थी। बारिश कभी तेज होती, कभी थम जाती, लेकिन भक्ति का प्रवाह नहीं थमा। भजनों की स्वर लहरियां, वाद्य यंत्रों की गूंज, तालियों की लय और बिजली की चमक मिलकर ऐसा दिव्य दृश्य रच रही थीं, जिसे देखने वाले शायद ही भूल पाएंगे। यह दृश्य श्री नौलखी मंदिर स्टेशन रोड पर रथ यात्रा महोत्सव के उपलक्ष्य में आयोजित हुई महाप्रभु जगन्नाथ जी की भजन संध्या में दिखाई दिया।
