*80 फीट नीचे मौत… ऊपर एक लाख लोगों की प्यास और इंटेकवेल में उतर गया कर्मयोगी*
*देवेन्द्र रघुवंशी,गंजबासौदा।* कहते हैं इतिहास हमेशा युद्धभूमि में नहीं लिखा जाता…कई बार वह वहां भी लिखा जाता है, जहां कोई तालियां नहीं बजतीं और कोई शौर्य पदक देने वाला मंच भी नहीं होता लेकिन गत दिवस शहर में ऐसा ही एक दृश्य सामने आया, जब बेतवा नदी के नौलखी घाट स्थित नगर को जल सप्लाई करने वाले नपा के अंधेरे इंटेकवेल की तलहटी में उतरा इतिहास एक 80 फीट गहरे में लिखा जाता है और शहर की जीवन रेखा बचाने वाले उन गुमनाम लोगों के साहस में दर्ज होता है, जिनके हाथों में हथियार नहीं, बल्कि जिम्मेदारी होती है। नगर पालिका की जल प्रदाय शाखा के प्रभारी सुनील यादव ने वह कर दिखाया, जिसकी हिम्मत करने से पहले कई लोगों के कदम रुक गए थे। जहां एक आदमी अपनी सुरक्षा से पहले लाखों लोगों की प्या
स के बारे में सोचता है। कुछ लोग नौकरी करने नहीं आते… वे समाज का ऋण चुकाने भी आते हैं। यह कहानी किसी सैनिक की नहीं है, जो सीमा पर दुश्मन से लड़ रहा हो बल्कि एक ऐसे कर्मयोगी की है, जो अपने ही शहर की लापरवाही से लड़ रहा था। उसका मुकाबला किसी हथियारबंद दुश्मन से नहीं था। उसके सामने दुश्मन था…नदी में फेंकी गई पॉलीथिन…घास-फूस…प्लास्टिक और वह कचरा, जिसने बेतवा की धारा को रोककर पूरे शहर की प्यास को कैद कर लिया था। उस दिन अगर वह भी बाकी लोगों की तरह खड़ा रह जाता, तो शायद कितने दिन और हमारा शहर पानी के लिए संघर्ष करता कह पाना मुश्किल है। लेकिन उस कर्मयोगी ने इंतजार नहीं चुना…उसने जिम्मेदारी चुनी…
जी हां, यह कहानी है गंजबासौदा के उस जाबांज की जिन्होंने बिना किसी सुरक्षा के 80 फीट गहरे अंधेरे इंटेकवेल में उतरकर न केवल जाम पाइप को साफ किया, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि लोकसेवा केवल कुर्सी पर बैठकर नहीं, कई बार अपनी जान जोखिम में डालकर भी निभाई जाती है। कुछ घटनाएं खबर बनकर खत्म हो जाती हैं, लेकिन कुछ अनुभव जीवन भर स्मृति में दर्ज रहते हैं। 80 फीट गहरे इंटेकवेल में नगर पालिका की जल प्रदाय शाखा के प्रभारी सुनील यादव के बिताए गए वे ढाई घंटे ऐसे ही थे। जहाँ हर सांस अनिश्चित थी, हर पल चुनौती था। जब वे नीचे उतरे, तब किसी को नहीं मालूम था कि अगली ढाई घंटे की कहानी कैसी होगी। ऊपर खड़े लोग केवल रस्सी को देख रहे थे, लेकिन नीचे हर पल साहस, धैर्य और जिम्मेदारी की परीक्षा चल रही थी। उस संघर्ष की साक्षी केवल अदृश्य शक्तियां और दुआएं थीं…सुनील के इस साहसिक कदम से उस दिन मेरा यह भ्रम भी टूट गया कि सरकारी कर्मचारी केवल कुर्सियों पर बैठते हैं। क्योंकि उस दोपहर…एक कर्मचारी ने अपनी नौकरी नहीं निभाई। उसने शहर की प्यास को अपना धर्म मान लिया और मौत के अंधेरे से पानी नहीं… जीवन निकाल लाया। पढ़िए, उस संघर्ष की पूरी दास्तान… सुनील की जुबानी से….
मालूम हो कि दो दिनों से शहर की जलापूर्ति ठप थी। लाखों लोगों के घरों के नल सूखे पड़े थे और पूरा शहर एक ही सवाल पूछ रहा था “पानी कब आएगा?” लेकिन उस सवाल का जवाब किसी फाइल या मशीन में नहीं, बल्कि 80 फीट गहरे अंधेरे में फंसा हुआ था। बेतवा नदी से शहर तक पानी पहुंचाने वाले इंटेक पाइप का मुहाना घास-फूस, प्लास्टिक, पॉलीथिन, लकड़ियों और नदी में बहकर आए कचरे से पूरी तरह जाम हो चुका था। नगर पालिका के कर्मचारी इंटेकवेल के किनारे खड़े होकर नीचे झांक रहे थे। टॉर्च की रोशनी भी कुछ फीट बाद अंधेरे में गुम हो जा रही थी। बाहर से बुलाए गए मजदूरों ने भी गहराई और खतरा देखकर साफ शब्दों में मना कर दिया “साहब, यह हमारे बस का काम नहीं है।” कुछ देर के लिए ऐसा लगा मानो शहर की प्यास भी उसी अंधेरे में कैद हो गई हो।
इसी बीच जल प्रदाय शाखा के प्रभारी सुनील यादव चुपचाप सब कुछ देख रहे थे। उन्होंने बिना किसी औपचारिक घोषणा के अपनी घड़ी उतारी, मोबाइल साथियों को सौंपा, जेब खाली की, बजरंगबली का स्मरण किया और कहा “सीढ़ी तैयार करो… मैं नीचे उतरता हूं।” यह सुनते ही वहां मौजूद कर्मचारी स्तब्ध रह गए। सभी ने उन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन निर्णय लिया जा चुका था। रस्सियां बांधी गईं, लोहे की सीढ़ी इंटेकवेल में उतारी गई और सुनील यादव अपने एक साथी के साथ धीरे-धीरे अंधेरे की ओर उतर गए।करीब 80 फीट नीचे पहुंचते ही उनके सामने वास्तविक चुनौती थी। वहां न पर्याप्त रोशनी थी, न खुली हवा। कम ऑक्सीजन, सीलन, फिसलन, गंदा पानी और चारों तरफ पसरा अंधेरा। पाइप का मुहाना प्लास्टिक, घास, लकड़ियों और कचरे के मोटे जाल से पूरी तरह बंद था। दोपहर करीब 12:45 बजे शुरू हुआ संघर्ष लगातार ढाई घंटे तक चलता रहा। लोहे की रॉड और हाथों की ताकत से कचरा हटाया जाता रहा। ऊपर खड़े कर्मचारियों को केवल रस्सी दिखाई दे रही थी। नीचे क्या हो रहा है, इसकी जानकारी केवल समय-समय पर मिलने वाले संकेतों से ही मिल रही थी।
करीब तीन बजे अचानक जोरदार बहाव के साथ बेतवा का पानी पाइप में दौड़ पड़ा। नीचे से रस्सी हिलाकर संकेत मिला “रास्ता साफ हो गया।” इंटेकवेल के बाहर खड़े कर्मचारियों के चेहरों पर राहत लौट आई। दो दिनों से बंद शहर की जलापूर्ति फिर शुरू होने की उम्मीद जाग उठी। कुछ देर बाद जब सुनील यादव बाहर आए तो उन्होंने सबसे पहले नौलखी की तपोभूमि को प्रणाम किया, सिद्ध संतों और बजरंगबली का स्मरण किया। उनके चेहरे पर किसी उपलब्धि का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि एक कर्म पूरा होने का संतोष था।यह घटना केवल एक पाइप खोलने की नहीं, बल्कि उस कर्तव्यनिष्ठता और साहस की मिसाल बन गई जिस समय अधिकांश लोग खतरे के कारण पीछे हट गए, उस समय एक सरकारी कर्मचारी ने अपनी जान से पहले शहर की प्यास को महत्व देकर यह साबित कर दिया कि लोकसेवा केवल दफ्तरों और फाइलों तक सीमित नहीं होती, बल्कि कई बार उसे निभाने के लिए 80 फीट गहरे अंधेरे में भी उतरना पड़ता है।
*बेतवा ने पानी रोका नहीं था… हमारे फेंके हुए कचरे ने शहर की प्यास रोक रखी थी*
जिस पाइप को खोलने के लिए एक कर्मयोगी को 80 फीट गहरे अंधेरे इंटेकवेल में उतरकर अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ी, उसे किसी बाढ़, भूकंप या प्राकृतिक आपदा ने जाम नहीं किया था। यह संकट हमारी अपनी लापरवाही का परिणाम था। रोजमर्रा की जिंदगी में बेपरवाही से नदी में फेंकी जाने वाली पॉलीथिन, प्लास्टिक की बोतलें, थैलियां, पूजा सामग्री, कपड़े, घास-फूस और अन्य कचरा बहते-बहते इंटेक पाइप के मुहाने पर जमा होता गया। समय के साथ यही कचरा शहर की जलापूर्ति का सबसे बड़ा दुश्मन बन गया। सुनील यादव ने पाइप से कचरा जरूर निकाला, लेकिन यह सवाल हम सबके सामने छोड़ गए कि क्या अगली बार भी किसी को हमारी लापरवाही की कीमत अपनी जान जोखिम में डालकर चुकानी पड़ेगी? अगर हम सचमुच उस साहस को सलाम करना चाहते हैं, तो सबसे बड़ा सम्मान यही होगा कि बेतवा को फिर कभी कूड़ेदान नहीं बनने देंगे। बेतवा हमारी माँ है…जीवनदायनी है, इसी की गोद से शहर के हजारों-लाखों लोगों तक पीने का पानी पहुंचता है। जिस नदी को हम मां कहकर पूजते हैं, उसी में यदि हम पॉलीथिन, प्लास्टिक, पूजा सामग्री और घरेलू कचरा फेंकेंगे, तो इसका दुष्परिणाम भी हमें ही भुगतना पड़ेगा।
*ऐसे कर्मवीरों का होना चाहिए सम्मान*
समाज और प्रशासन को ऐसे साहसिक कार्य करने वाले कर्मचारियों को केवल धन्यवाद ही नहीं, बल्कि सार्वजनिक सम्मान भी देना चाहिए। नगर पालिका के जल प्रदाय शाखा प्रभारी सुनील यादव ने जिस साहस और कर्तव्यनिष्ठा का परिचय दिया, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है। उस दिन उन्होंने इंटेक्टवेल में केवल जाम पाइप नहीं खोला, बल्कि पूरे शहर की प्यास बुझाकर यह साबित कर दिया कि कुछ लोग नौकरी करने नहीं आते… वे सचमुच समाज का ऋण चुकाने आते हैं।
