– भारत की अध्यक्षता में 11वीं ब्रिक्स सांस्कृतिक मंत्रियों की बैठक भोपाल में संपन्न
– केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में दी बैठक की उपलब्धियों की जानकारी
– बोले, भोपाल घोषणा पत्र से ब्रिक्स देशों के बीच सांस्कृतिक सहयोग को मिलेगी नई दिशा
भोपाल/जोधपुर, 8 अगस्त। भारत की अध्यक्षता में पिछले तीन दिनों से चल रही ब्रिक्स संस्कृति से जुड़ी बैठकों का समापन भोपाल घोषणा पत्र को अपनाए जाने के साथ हुआ। 11वीं ब्रिक्स सांस्कृतिक मंत्रियों की बैठक में सदस्य देशों और साझेदार देशों ने संस्कृति, विरासत, कला, रचनात्मक उद्योग और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के क्षेत्र में सहयोग को और मजबूत करने के लिए एक व्यावहारिक और दूरदर्शी रूपरेखा पर सहमति बनाई। केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने बैठक के समापन पर आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि इस बार तैयार किया गया भोपाल घोषणा पत्र केवल सामान्य घोषणा नहीं, बल्कि लक्ष्य और उनके क्रियान्वयन की दिशा तय करने वाला आउटकम आधारित दस्तावेज है।
शनिवार को पत्रकारों से रू-ब-रू होते हुए केंद्रीय मंत्री शेखावत ने कहा कि ब्रिक्स संस्कृति समूह की पहली बैठक 29-30 अप्रैल को वर्चुअल माध्यम से हुई थी। इसके बाद 4-5 जून को वाराणसी में कार्य समूह की दूसरी बैठक आयोजित की गई। इन बैठकों में जिन विषयों पर प्रारंभिक चर्चा हुई, उन्हें आगे बढ़ाते हुए भोपाल में मंत्रिस्तरीय स्तर पर विचार-विमर्श किया गया। इस पूरी प्रक्रिया के बाद भोपाल घोषणापत्र को अपनाया गया। उन्होंने बताया कि भोपाल में हुई मंत्रिस्तरीय बैठक में भारत सहित कुल 14 देशों ने भाग लिया। इनमें 10 ब्रिक्स सदस्य देश और चार साझेदार देश शामिल रहे। बैठक में 55 प्रतिनिधियों की सहभागिता रही। भारत ने अपनी अध्यक्षता के दौरान संस्कृति समूह के लिए “लचीलापन, नवाचार, सहयोग और सतत विकास के लिए मजबूत आधार तैयार करना” को आधार बनाया। शेखावत के अनुसार इसका उद्देश्य सांस्कृतिक क्षेत्र में ऐसा सहयोग विकसित करना था, जो टिकाऊ होने के साथ-साथ स्वतंत्र, व्यावहारिक और आसानी से लागू किया जा सके।
बैठक में सांस्कृतिक संपदाओं की वापसी (रेस्टिट्यूशन) भी महत्वपूर्ण विषय रहा। विभिन्न देशों से चोरी या गलत तरीके से बाहर ले जाई गई पुरातात्विक और सांस्कृतिक वस्तुओं को उनके मूल देशों में वापस लाने के लिए सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी। शेखावत ने कहा कि किसी सांस्कृतिक संपदा का महत्व केवल आर्थिक नहीं होता। उसके साथ किसी देश, समाज और समुदाय की भावनाएं तथा ऐतिहासिक विरासत जुड़ी होती है। इसलिए ऐसी वस्तुओं को वापस लाना सांस्कृतिक न्याय का भी विषय है। उन्होंने बताया कि भारत ने पिछले वर्षों में इस दिशा में तेजी से काम किया है। केंद्रीय मंत्री शेखावत ने कहा कि वर्ष 2014 तक जब नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने, तब तक केवल 13 ऐसी हमारी पुरातात्विक संपदाएं दुनिया से लौट करके वापस भारत ला पाए थे। आज वह आंकड़ा 700 को पार कर चुका है। अभी जिस दिशा में हम जिस गति के साथ में काम कर रहे हैं, मुझे लगता है कि यह साल जब तक समाप्त होगा, यह आंकड़ा 1,000 तक पहुंच जाएगा।
पहली बार लक्ष्य और समयसीमा पर जोर
भोपाल घोषणा पत्र की सबसे बड़ी विशेषता इसे आउटकम आधारित दस्तावेज के रूप में तैयार करना रही। शेखावत ने कहा कि आमतौर पर इस तरह की अंतरराष्ट्रीय बैठकों में घोषणापत्र में व्यापक सिद्धांत और विचार दर्ज किए जाते हैं, लेकिन इस बार लक्ष्य तय करने के साथ उन्हें हासिल करने के रास्ते और आगे की कार्यप्रणाली पर भी स्पष्ट रूप से चर्चा की गई। घोषणा पत्र का मुख्य उद्देश्य ब्रिक्स देशों के बीच सांस्कृतिक सहयोग के संस्थागत ढांचे को मजबूत करना और संस्कृति तथा विरासत के पारंपरिक एवं आधुनिक दोनों क्षेत्रों में साझा रोडमैप तैयार करना है। इसमें सांस्कृतिक और रचनात्मक उद्योग को विशेष महत्व दिया गया है।
शेखावत ने कहा कि दुनिया में तेजी से बढ़ रही क्रिएटिव इकोनॉमी में कलाकारों, रचनाकारों और शिल्पकारों के लिए नए अवसर पैदा करने पर भी जोर दिया गया। इसके तहत सदस्य देशों के बीच श्रेष्ठ कार्यप्रणालियों को साझा करने, कलाकारों के नेटवर्क को मजबूत करने, एक-दूसरे के अनुभवों से सीखने और डिजिटल माध्यमों का उपयोग करके कलाकारों तथा शिल्पकारों को नए बाजारों तक पहुंचाने की संभावनाओं पर चर्चा हुई। इस पहल का उद्देश्य केवल
सरकारों के बीच सहयोग बढ़ाना नहीं है, बल्कि कलाकारों और आम लोगों के बीच भी संपर्क मजबूत करना है। इससे सांस्कृतिक कूटनीति को जन-जन के स्तर तक ले जाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
स्वैच्छिक कलाकार रजिस्ट्री का प्रस्ताव
भोपाल बैठक में भारत के एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव को सभी साझेदार देशों का समर्थन मिला। इसके तहत वॉलंटरी आर्टिस्ट रजिस्ट्री विकसित करने पर सहमति बनी। इस रजिस्ट्री का उद्देश्य ब्रिक्स देशों के सांस्कृतिक और कलात्मक क्षेत्र से जुड़े पेशेवरों को एक-दूसरे से जोड़ना होगा। इससे कलाकारों को दूसरे सदस्य देशों में जाकर काम करने, अपनी कला प्रस्तुत करने और नए अवसर तलाशने में सुविधा मिल सकेगी। शेखावत ने कहा कि इस व्यवस्था से कलाकारों के बीच नेटवर्क मजबूत होगा और एक स्थायी सांस्कृतिक आदान-प्रदान की प्रक्रिया विकसित की जा सकेगी। ब्रिक्स देशों के कलाकार एक-दूसरे के अनुभवों और परंपराओं को समझ सकेंगे तथा संयुक्त रूप से नई रचनात्मक परियोजनाओं पर काम करने के अवसर भी बढ़ेंगे।
साझा विरासत के संरक्षण पर जोर
भोपाल घोषणा पत्र में यूनेस्को की बहुपक्षीय नामांकन प्रक्रिया में सहयोग बढ़ाने पर भी जोर दिया गया। शेखावत ने बताया कि यदि कई देश मिलकर किसी साझा सांस्कृतिक या ऐतिहासिक विरासत के लिए नामांकन करते हैं तो सहयोग का दायरा बढ़ सकता है। इसी दृष्टि से ब्रिक्स देशों के बीच सामूहिक विरासत के संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय मान्यता के लिए सहयोग की संभावनाओं पर चर्चा हुई। उन्होंने सारनाथ का उदाहरण देते हुए बताया कि भारत ने हाल में इसे विश्व धरोहर के रूप में नामित कराने में सफलता प्राप्त की है। उन्होंने कहा कि भारत की टेंटेटिव लिस्ट में अभी भी बड़ी संख्या में सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्थल शामिल हैं और आने वाले समय में इनके संरक्षण तथा अंतरराष्ट्रीय पहचान के लिए प्रयास जारी रहेंगे।
पारंपरिक ज्ञान अगली पीढ़ी तक पहुंचाना चुनौती
भोपाल घोषणा पत्र में पारंपरिक ज्ञान और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के संरक्षण को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया। इसमें पारंपरिक नृत्य, दृश्य कला, प्रदर्शनकारी कला और अन्य सांस्कृतिक परंपराओं को संरक्षित करने तथा उन्हें अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की जरूरत पर जोर दिया गया। केंद्रीय मंत्री शेखावत ने कहा कि सांस्कृतिक विरासत केवल किसी एक पीढ़ी की संपत्ति नहीं है। हम उसके मालिक नहीं, बल्कि उसके संरक्षक हैं। हमें जो विरासत पिछली पीढ़ियों से मिली है, उसे बिना क्षरण और विलुप्ति के अगली पीढ़ी तक पहुंचाना हमारी जिम्मेदारी है। इसी तरह संग्रहालयों, पुस्तकालयों और अभिलेखागार में सुरक्षित दस्तावेजी विरासत के संरक्षण के लिए भी देशों के बीच संस्थागत सहयोग विकसित करने की जरूरत पर बल दिया गया।
‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की भावना
केंद्रीय मंत्री शेखावत ने कहा कि भारत की अध्यक्षता में आयोजित इस पूरे सांस्कृतिक कार्यक्रम के पीछे भारतीय विचार ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः’ की भावना रही। उनका कहना था कि अलग-अलग देशों की भाषा, संगीत और कला अलग हो सकती है, लेकिन शांति, सद्भाव और मानव कल्याण की भावना सभी को जोड़ती है। इसी साझा भावना को सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से भी सामने लाने का प्रयास किया गया। विभिन्न देशों के कलाकारों को एक मंच पर लाकर यह संदेश देने की कोशिश की गई कि संस्कृति देशों के बीच दूरी कम करने और आपसी समझ बढ़ाने का प्रभावी माध्यम बन सकती है।
