सफलता की कहानी
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“हमें अस्पताल की ज़रूरत नहीं” से सुरक्षित प्रसव तक, भरोसे से बदली एक कहानी==
ये कहानी दमोह जिले के तेन्दूखेड़ा ब्लॉक के खामखेड़ा गांव में रहने वाली दसोदा गोंड की है। दसोदा के लिए यह गर्भावस्था कोई अलग अनुभव नहीं थी। करीब 40 वर्ष की उम्र में, पांच बेटियों की मां दसोदा अपने छठे बच्चे की उम्मीद कर रही थीं। उनके परिवार में पहले भी सभी प्रसव घर पर ही हुए थे और किसी तरह की बड़ी परेशानी नहीं आई थी। इसलिए इस बार भी परिवार को यही लग रहा था कि सब पहले जैसा ही ठीक रहेगा। इसलिए छठे प्रसव की तैयारी भी घर पर ही कराने की बात चल रही थी।

आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ने जब दसोदा को गर्भावस्था का पंजीकरण कराने और जांच के लिए स्वास्थ्य केंद्र जाने की सलाह दी, तो परिवार ने इसे जरूरी नहीं समझा। उनका मानना था कि जब पहले कभी अस्पताल जाने की जरूरत नहीं पड़ी, तो अब क्यों जाएं। अतः उन्होंने आशा कार्यकर्त्ता की एक न सुनी और पंजीकरण कराने से मना कर दिया।
दसोदा की स्थिति इस बार सामान्य नहीं थी। उम्र अधिक होने और कई बार प्रसव हो चुके होने के कारण यह गर्भावस्था उच्च जोखिम में थी। इसके बावजूद परिवार की मनाही के चलते दसोदा का न पंजीकरण हुआ था, ना उन्होंने कोई जांच कराई थी और न ही दसोदा को आवश्यक दवाइयां या टीकाकरण मिल पाया था।
दसोदा की स्थिति बहुत ही संवेदनशील थी, इसलिए स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं द्वारा यह मामला AAA बैठक के दौरान उठाया गया और गाँव के लोगों को बताया गया कि दसोदा की स्थिति गंभीर है अगर ऐसे में प्रसव घर पर होता है तो जच्चा और बच्चा दोनों को खतरा हो सकता है। दसोदा का नाम सामने आने के बाद, सक्रिय समुदाय सदस्य शीलरानी सेन ने आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के साथ मिलकर दसोदा के परिवार को संस्थागत प्रसव के लिए मनाने के प्रयास शुरू कर दिए। इस प्रयास में स्वास्थ्य विभाग और अंतरा फाउंडेशन का भी सहयोग था, जिससे इस केस पर लगातार निगरानी और समर्थन संभव हो सका।

टीम ने दसोदा के घर नियमित रूप से जाना शुरू किया। परिवार से बातचीत की, उनकी सोच को समझा और धीरे-धीरे उन्हें स्वास्थ्य सेवाओं के महत्व के बारे में समझाया। कई बार बातचीत अधूरी रह जाती, लेकिन टीम ने लगातार प्रयास जारी रखे। कुछ समय बाद, परिवार जांच के लिए तैयार हो गया। जांच में पता चला कि दसोदा एनीमिया से ग्रस्त हैं, जिससे गर्भावस्था का जोखिम और बढ़ गया था। इसके बाद उनका पंजीकरण कराया गया और उन्हें नियमित देखभाल मिलनी शुरू हुई। उन्हें आयरन सुक्रोज़ दिया गया, साथ ही आयरन और कैल्शियम की गोलियां दी गईं। पोषण और देखभाल को लेकर उन्हें आंगनवाड़ी कार्यकर्त्ता द्वारा समझाया गया।
इसके बाद भी टीम का साथ बना रहा। नियमित रूप से घर जाकर फॉलो-अप किया गया, दवाइयों की जानकारी दी गई और परिवार को हर कदम पर सहयोग दिया गया। इस निरंतर प्रयास का असर धीरे-धीरे दिखने लगा। दसोदा की सेहत में सुधार हुआ और उनके परिवार का नजरिया भी बदलने लगा। जो परिवार पहले अस्पताल जाने से हिचक रहा था, वही अब नियमित जांच और देखभाल के लिए तैयार रहने लगा।
अंततः, स्वास्थ्य विभाग, समुदाय और अंतरा फाउंडेशन के संयुक्त प्रयासों से दसोदा ने संस्थागत प्रसव के लिए सहमति दी। निर्धारित समय पर उन्हें स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया, जहां उनका सुरक्षित प्रसव हुआ। मां और नवजात दोनों स्वस्थ हैं।
यह कहानी बताती है कि सही जानकारी, धैर्य और लगातार साथ मिलकर किया गया प्रयास कैसे एक परिवार के फैसले को बदल सकता है। जब समुदाय, स्वास्थ्य तंत्र और सहयोगी संस्थाएं साथ मिलकर काम करती हैं, तो जोखिम भरी स्थिति को भी सुरक्षित परिणाम में बदला जा सकता है।
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