*दमोह का ऐतिहासिक दुर्गा दरबार: 1851 में स्थापित हुईं मां जगतजननी, हटा में बनी थी मिट्टी की प्रतिमा, साल में दो बार मिलते हैं दर्शन*मप्र रटेड हेड एस के पटैल चाणक्य न्यूज़ इंडिया लाइव टीवी*
*1857 की क्रांति से छह वर्ष पहले स्थापित हुआ था भारत दुर्गा देवालय, दशहरे से जुड़ी है ऐतिहासिक परंपरा; पंडित हरप्रसाद भारत ने की थी स्थापना, वर्तमान में पंडित शांतनु भारत गुरुजी निभा रहे पूजा-अर्चना की जिम्मेदारी*
*दमोह-* मध्य प्रदेश के दमोह जिले की धार्मिक और ऐतिहासिक विरासत में मां जगतजननी का भारत दुर्गा देवालय विशेष स्थान रखता है। लगभग 175 वर्ष से अधिक पुराना यह मंदिर अपनी प्राचीन परंपराओं, मिट्टी से निर्मित मां दुर्गा की अद्भुत प्रतिमा और साल में केवल दो बार दर्शन की व्यवस्था के कारण श्रद्धालुओं के बीच विशेष पहचान रखता है। मंदिर का इतिहास वर्ष 1851 से जुड़ा है, जब यहां मां जगतजननी की प्रतिमा स्थापित की गई थी। यह वह दौर था, जब देश में अंग्रेजी शासन था और 1857 की क्रांति होने में अभी छह वर्ष शेष थे।
दमोह जिला मुख्यालय स्थित इस प्राचीन दरबार में मां दुर्गा की आराधना केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक परंपरा का प्रतीक भी है। चैत्र और क्वार के नवरात्र में मंदिर के पट खुलने पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु मां के दर्शन करने पहुंचते हैं। स्थानीय श्रद्धालुओं के साथ अन्य जिलों और प्रदेशों से भी भक्त यहां पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं तथा मां जगतजननी से सुख, समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं।
*1851 में पंडित हरप्रसाद भारत ने की थी मंदिर की स्थापना*
भारत दुर्गा देवालय की स्थापना का इतिहास पंडित हरप्रसाद भारत से जुड़ा हुआ है। बताया जाता है कि उन्होंने वर्ष 1851 में मां जगतजननी की प्रतिमा स्थापित कर मंदिर में पूजा-अर्चना की परंपरा प्रारंभ की थी। इसके बाद समय के साथ मंदिर की धार्मिक मान्यताएं और परंपराएं पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रहीं।
वर्तमान में पंडित हरप्रसाद भारत की पीढ़ी के पंडित शांतनु भारत गुरुजी मां की पूजा-अर्चना और सेवा की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। नवरात्र के दौरान पुजारी परिवार के सदस्य धार्मिक अनुष्ठानों और मंदिर की व्यवस्थाओं में जुटे रहते हैं।
इतने लंबे समय तक एक ही परिवार द्वारा परंपरा का निर्वहन किया जाना इस मंदिर की विशेष पहचान है। बदलते समय के बावजूद यहां प्राचीन धार्मिक मान्यताओं को संरक्षित रखने का प्रयास किया जा रहा है।
*हटा में हुआ था मां की प्रतिमा का निर्माण, बैलगाड़ी से दमोह लाई गई थीं माता रानी*
भारत दुर्गा देवालय की सबसे खास विशेषताओं में से एक यहां विराजमान मां दुर्गा की मिट्टी से निर्मित प्रतिमा है। मंदिर से जुड़ी जानकारी के अनुसार, माता रानी की प्रतिमा का निर्माण दमोह जिले के हटा में किया गया था। उस समय प्रतिमा को हटा से दमोह लाने के लिए बैलगाड़ी का सहारा लिया गया था।
आज जब परिवहन के आधुनिक साधनों से लंबी दूरी तय करना आसान हो गया है, ऐसे में लगभग पौने दो शताब्दी पुरानी इस परंपरा की कहानी उस दौर की परिस्थितियों की याद दिलाती है।
मिट्टी से निर्मित मां दुर्गा की दस भुजाओं वाली प्रतिमा में माता रानी को राक्षस का संहार करते हुए दर्शाया गया है। प्रतिमा का यह स्वरूप बुराई पर अच्छाई, अधर्म पर धर्म और अन्याय पर न्याय की विजय का संदेश देता है। प्रतिमा के दोनों ओर विराजमान गणिकाएं भी इसके स्वरूप को विशिष्ट बनाती हैं।
श्रद्धालुओं के लिए यह प्रतिमा केवल पूजा का केंद्र नहीं, बल्कि प्राचीन शिल्पकला, धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक विरासत से जुड़ी एक महत्वपूर्ण धरोहर है।
साल में दो बार खुलते हैं मंदिर के पट, चैत्र और शारदीय नवरात्र में होते हैं दर्शन
भारत दुर्गा देवालय की सबसे अनूठी परंपराओं में से एक यह है कि यहां मां जगतजननी के दर्शन मुख्य रूप से वर्ष में दो बार, चैत्र नवरात्र और क्वार यानी शारदीय नवरात्र के दौरान होते हैं।
इन दोनों अवसरों पर मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। मंदिर के पट खुलने के साथ ही श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो जाता है। भक्त मां के दर्शन कर पूजा-अर्चना करते हैं और अपनी मनोकामनाएं लेकर माता रानी के दरबार में हाजिरी लगाते हैं।
साल में सीमित अवधि के दौरान दर्शन की यह परंपरा मंदिर को अन्य धार्मिक स्थलों से अलग पहचान देती है। मां के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह रहता है। नवरात्र के दौरान मंदिर का वातावरण भक्तिमय हो जाता है और मां के जयकारों से पूरा परिसर गूंज उठता है।
*दशहरे पर नगर भ्रमण के लिए निकलती थीं मां जगतजननी*
मंदिर से जुड़ी पुरानी परंपराओं में दशहरे का विशेष महत्व रहा है। स्थानीय जानकारी के अनुसार, प्रतिमा की स्थापना के बाद दशहरे के अवसर पर मां जगतजननी की प्रतिमा को नगर भ्रमण के लिए बाहर निकाला जाता था। यह आयोजन धार्मिक आस्था और परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता था।
हालांकि, समय के साथ इस परंपरा में बदलाव आया और मां की प्रतिमा को मंदिर में ही विराजमान रखने की परंपरा शुरू हो गई। इस बदलाव के पीछे मंदिर से जुड़ी एक ऐतिहासिक घटना और स्थानीय मान्यता का उल्लेख किया जाता है।
*वर्ष 1944 में गौहत्या विरोधी आंदोलन से जुड़ा है मंदिर का इतिहास*
भारत दुर्गा देवालय से जुड़ी प्रचलित मान्यता के अनुसार, वर्ष 1944 में दमोह में गौहत्या के विरोध में एक आंदोलन हुआ था। बताया जाता है कि यह आंदोलन द्वारका प्रसाद श्रीवास्तव के नेतृत्व में किया गया था।
इसी दौरान दशहरे के चल समारोह के बीच अंग्रेज अधिकारियों द्वारा जुलूस को रोक दिए जाने की बात कही जाती है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, इस घटनाक्रम के बाद मां दुर्गा की प्रतिमा को लगभग 22 दिनों तक पुराने थाने में रखा गया था। बताया जाता है कि इस अवधि में भी माता रानी की पूजा-अर्चना जारी रही।
यह प्रसंग मंदिर की ऐतिहासिक स्मृतियों और स्थानीय जनश्रुतियों में विशेष स्थान रखता है। हालांकि, इस घटना के विस्तृत विवरण की स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे मंदिर से जुड़ी प्रचलित मान्यता के रूप में ही देखा जाना उचित है।
*पुजारी की प्रार्थना और जुलूस आगे बढ़ाने के आदेश की प्रचलित मान्यता*
मंदिर से जुड़ी एक अन्य मान्यता के अनुसार, जब मां की प्रतिमा पुराने थाने में रखी हुई थी, तब पुजारी ने माता रानी से प्रार्थना की थी कि जुलूस पर लगा प्रतिबंध समाप्त हो जाए और भविष्य में मां की प्रतिमा को मंदिर से बाहर नहीं निकाला जाए।
प्रचलित कथा के मुताबिक, इसी दौरान अंग्रेज अधिकारियों की ओर से रुके हुए जुलूस को आगे बढ़ाने के आदेश जारी किए गए। श्रद्धालु इस घटनाक्रम को मां जगतजननी की कृपा और उनकी महिमा से जोड़कर देखते हैं।
इसके बाद मां की प्रतिमा को मंदिर में ही विराजमान रखने की परंपरा आगे बढ़ने की बात कही जाती है। यह मान्यता आज भी मंदिर से जुड़े लोगों और श्रद्धालुओं के बीच सुनाई जाती है।
यह प्रसंग धार्मिक आस्था के साथ-साथ उस दौर के सामाजिक और राजनीतिक वातावरण की याद भी दिलाता है। हालांकि, इस घटना के संबंध में उपलब्ध विवरण को ऐतिहासिक दस्तावेजों से प्रमाणित तथ्य के बजाय स्थानीय परंपरा और जनश्रुति के रूप में प्रस्तुत करना आवश्यक है।
*हटा और दमोह की धार्मिक विरासत का महत्वपूर्ण केंद्र है भारत दुर्गा देवालय*
दमोह जिले का भारत दुर्गा देवालय अपनी प्राचीनता और विशिष्ट धार्मिक परंपराओं के कारण महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इस मंदिर का इतिहास हटा से भी जुड़ता है, क्योंकि यहां विराजमान मां दुर्गा की प्रतिमा का निर्माण हटा में किए जाने की जानकारी मिलती है।
इस प्रकार मंदिर की कहानी केवल दमोह तक सीमित नहीं है, बल्कि जिले के अलग-अलग क्षेत्रों के बीच ऐतिहासिक और धार्मिक संबंधों को भी सामने लाती है।
मिट्टी की प्रतिमा, बैलगाड़ी से माता रानी को दमोह लाने की परंपरा, साल में दो बार दर्शन और दशहरे से जुड़ी मान्यताएं इस मंदिर को विशिष्ट बनाती हैं। मंदिर से संबंधित इन परंपराओं को संरक्षित रखना जिले की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
*पीढ़ियों से जारी है मां की सेवा, नवरात्र में उमड़ती है श्रद्धा*
लगभग 175 वर्ष से अधिक पुराना भारत दुर्गा देवालय आज भी अपनी परंपराओं के कारण श्रद्धालुओं के बीच विशेष स्थान रखता है। पंडित हरप्रसाद भारत द्वारा प्रारंभ की गई पूजा-अर्चना की परंपरा को वर्तमान में पंडित शांतनु भारत गुरुजी आगे बढ़ा रहे हैं।
चैत्र और शारदीय नवरात्र के दौरान मां के दर्शन के लिए श्रद्धालु पहुंचते हैं। मंदिर में होने वाली पूजा-अर्चना और धार्मिक गतिविधियां इस प्राचीन दरबार की पहचान को जीवंत बनाए रखती हैं।
दमोह का यह प्राचीन दुर्गा दरबार आस्था, इतिहास और परंपरा का ऐसा संगम है, जहां मिट्टी से निर्मित मां जगतजननी की प्रतिमा लगभग पौने दो शताब्दियों से श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनी हुई है। हटा में प्रतिमा का निर्माण, बैलगाड़ी से उसे दमोह लाने की कहानी और साल में दो बार दर्शन की परंपरा इस मंदिर को जिले के विशिष्ट धार्मिक स्थलों में शामिल करती है। समय बदलता रहा, पीढ़ियां बदलती रहीं, लेकिन मां जगतजननी के प्रति श्रद्धा और उनकी सेवा की परंपरा आज भी जारी है।
