प्रश्न:- महाराज जी, “सखी स्वरूप अर्चाविग्रह” के इतिहास और डॉ हनुमान के नाम से प्रसिद्ध के विषय मे कुछ जानकारी दीजिए?
◆उत्तर:- कुलदीप जी! ऐसी जनश्रुति है कि,राजा, रजवाड़ों के समय दंदरौआ गाँव, राजा धौलपुर (राजस्थान) के आधिपत्य में था। जब राजा यहाँ से जाने लगे तब ग्वालियर के रौरा गाँव के निवासी कुँअर अमृत सिंह (मितबाबा) जो गुर्जर क्षत्रिय वंश के चंदेल राजाओं के वंशज थे, ने इस गाँव को खरीद लिया। इस लिये ये गांव गुर्जर बाहुल्य है। इस गाँव मे श्री हनुमान जी के इस अर्चाविग्रह की दो कहानियां जनश्रुति से सुनने को मिलती हैं। पहली यह की हनुमान जी का सखी विग्रह एक तालाब से मिला था, दूसरी जनश्रुति ये है कि शैल विग्रह किसी नीम के वृक्ष के अन्दर खोखले तने में छिपा था। जब किसी ने निर्माण कार्य के उद्देश्य से इस पेड़ को काटना चाहा तो वृक्ष के काटने के दौरान उसकी आवाज से ऐसा लगा कि खोखले पेड़ के अन्दर कुछ है? और उसी दौरान ग्रामीणों ने श्री हनुमान जी के इस शैल विग्रह को बाहर निकाल कर चबूतरे में रख कर पूजा प्रारम्भ कर दी। लेकिन जैसा कि सभी जानते हैं कि किसी भी देवी-देवता के अर्चाविग्रह की महिमा से लोग तभी परिचित होते हैं, जब कोई साधक या संत अपने तपोबल से उस क्षेत्र को सकारात्मक उर्जा का केंद्र बना देता है। इस स्थान को वो सकारात्मक उर्जा हमारे गुरुमहाराज श्री श्री 1008 महन्त बाबा पुरुषोत्तम दास जी महाराज की तपस्या से प्राप्त हुई है।
#प्रश्न:- महाराज जी! क्या इन्हें लोग सुरू से ही डॉ हनुमान कहते थे?
◆उत्तर:- नहीं, सुरू में “सखी विग्रह”के हमारे श्री हनुमान जी को लोग “खतिया महाबीर” के नाम से पुकारते थे। जब महन्त बाबा श्री पुरुषोत्तम दास महाराज मंदिर के महंत बने, और उन्होंने हवन कुंड की भभूति को लोगों को प्रसाद स्वरूप में देना सुरु किया और पास के ग्रामीण जिन्हें चर्म रोग, फोड़ा फुंसी आदि होते थे, वे यहाँ आते थे, अपनी अर्जी लगाते थे, और भभूति लेकर पाँच मंगलवार या शनिवार परिक्रमा कर ठीक हो जाते थे, तभी से ग्रामीण को लगा कि ये तो “दर्द हरण” करने वाले चिकित्सक हैं, और उनकी आस्था और विश्वास ने इन्हें डॉ. हनुमान नाम दे दिया।
#प्रश्न:- महाराज जी! कुछ विद्वानों का कहना है कि अष्टसिद्धि, नवनिधि के गुणों से पूर्ण हनुमान जी के पहले ‘डॉक्टर’ की उपाधि लगाना उनके व्यक्तित्व को सीमित नहीं कर देता?
◆उत्तर:- कुलदीप जी! ये अच्छा प्रश्न है, जो हमें उनके डॉक्टर उपाधि पर विस्तृत दृष्टिकोण बताने का अवसर देता है। बाल्मीकि रामायण में श्लोक है-
एतस्य बाहुवीर्येण लंका सीता च लक्ष्मणः
प्राप्ताभया जजश्चैव राज्यं मित्राणि बान्धवाः ।
हनुमान यदि में न स्याद, वानराधि पतेः सखा, प्रवृन्तिमपि को वेन्तुं जानक्यः शक्तिमान भवेत।।
(वा. रा.7/35/9-10)
बाल्मीकि रामायण के उक्त श्लोक में कहा गया है कि श्री हनुमान जी के विषय में स्वयं भगवान श्री राम ने ये भाव कृतज्ञता पूर्वक उन्हें स्मरण करते हुए कहे है कि “इन हनुमान के बाहुबल से, मैंने लंका पर विजय प्राप्त की। अपनी प्रिय पत्नी सीता को पुनः प्राप्त किया। मृत्यु सैय्या पर लेटे सहोदर भाई लक्ष्मण को पुनः जीवित रूप में पाया। वानराधिपत सुग्रीव एवं राक्षस श्रेष्ठ विभीषण आदि को मित्र रूप में पाने में तथा पुनः अयोध्या लौट कर राज्य एवं बंधु बांधवों को पाने में समर्थ हुआ। यदि वानरराज सुग्रीव के मित्र हनुमान मेरे सहायक न होते। तो भला प्राण प्रिया जानकी का समाचार जानने में भी कौन समर्थ हो सकता था?
सर्वासु विद्यासु तपोविधाने,
प्रस्पर्धतेऽयं हिं गुरु सुराणा।
सोऽयं नवव्याकरणार्थ वेत्ता,
ब्रह्मा भविष्यत्पति ते प्रसादात ।।
बाल्मीकि रामायण के उक्त श्लोक में कहा गया है कि श्री हनुमान जी के विषय में स्वयं भगवान श्री राम ने ये भाव कृतज्ञता पूर्वक उन्हें स्मरण करते हुए कहे है कि “इन हनुमान के बाहुबल से, मैंने लंका पर विजय प्राप्त की। अपनी प्रिय पत्नी सीता को पुनः प्राप्त किया। मृत्यु सैय्या पर लेटे सहोदर भाई लक्ष्मण को पुनः जीवित रूप में पाया। वानराधिपत सुग्रीव एवं राक्षस श्रेष्ठ विभीषण आदि को मित्र रूप में पाने में तथा पुनः अयोध्या लौट कर राज्य एवं बंधु बांधवों को पाने में समर्थ हुआ। यदि वानरराज सुग्रीव के मित्र हनुमान मेरे सहायक न होते। तो भला प्राण प्रिया जानकी का समाचार जानने में भी कौन समर्थ हो सकता था?
सर्वासु विद्यासु तपोविधाने,
प्रस्पर्धतेऽयं हिं गुरु सुराणा।
सोऽयं नवव्याकरणार्थ वेत्ता,
ब्रह्मा भविष्यत्पति ते प्रसादात ।।
बाल्मीकी रामायण के उक्त श्लोक में कहा गया कि
श्री हनुमान जी के विषय में महर्षि अगस्त्य ने कहा है कि हनुमान जी सम्पूर्ण विद्याओं के ज्ञान तथा तपस्या के अनुष्ठान में ये देवगुरु बृहस्पति की बराबरी करते है। नवीन व्याकरणों के सिद्धान्त को जानने वाले ये हनुमान जी आप की कृपा से अगले कल्प में साक्षात ब्रह्मा होंगे। ऐसे सकलगुण निधान अष्टसिद्धी प्राप्त, नौ निधि के दाता हमारे श्री हनुमान जी, समाज विज्ञान, राजनीति विज्ञान, अर्थशास्त्र, चिकित्सा शास्त्र, धर्म एवं आध्यात्म दर्शन आदि सभी विषयों के विशेषज्ञ है। इसी लिए इन समस्त विषयों में पी.एच. डी. प्राप्त श्री हनुमान जी को भक्ति भाव से “डाक्टर” की उपाधि दी गई है। श्री दैदरौआ धाम, डॉ हनुमान की कृपा से लोगों के विभिन्त्र असाध्य रोगों के निवारण का केन्द्र बन गया है। हम स्वयं उनकी इस चमत्कृत कृपा से आश्चर्य चकित रह जाते है जब श्रद्धालु हमें आकर बताते है कि उसका अमुक असाध्य रोग यहाँ आने मात्र से उनके दर्शन से दूर हो गया।
#प्रश्न:- महाराज जी! दंदरौआ धाम के हनुमान जी का शैल अर्चाविग्रह “सखी स्वरूप”‘ के नृत्य मुद्रा का है। मूर्तिकार के मस्तिष्क में ये कल्पना किस प्रशंग की है?
◆उत्तर:- कुलदीप जी! हमारे हनुमान जी का मुखारबिन्द रमणीक बालिका की तरह आकर्षित करता है, उनके नयन कमल के पत्तों की तरह, और नृत्य करती, मुद्रा श्रृंगार से आक्षादित रहती है। नृत्य मुद्रा में उनका एक हाथ कमर पर तो दूसरा सिर पर है। उनका स्वरूप विग्रह वात्सल्य से भरा है। और उनकी गदा बगल में रखी हुई है। उनके ठीक सामने उनके आराध्य माता सीता, भगवान श्री राम, भाई लक्ष्मण की प्रसन्न चित्त मूर्तियाँ प्रतिष्ठित है। ऐसा लगता है जैसे साक्षात श्री हनुमान जी अपनी माँ जानकी, भगवान राम को देख कर भक्ति भाव से सखी बन कर नृत्य कर रहे है।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरित मानस के बालकांड में पुष्प वाटिका में सीता जी के द्वारा गिरजा (पार्वती) जी की पूजा के प्रसंग में दोहा न. 227 की चौपाई न-4 में लिखा है-
एक सखी सिय संगु बिहाई। गई रही देखन फुलवाई ।। तेहिं दोउ बंधु बिलोके जाई। प्रेम बिबस सीता पहिं आई ।।
कहूँ कारनु निज हरष कर, पूँछहि सब मृदु बैन।।
(बा. 228)
दो.- तासु दसा देखी सखिन्ह, पुलक गात जलु नैन।
चौ- देखन बागु कुँअर दुइ आये। बय किशोर सब भाँति सुहाए।
श्याम गौर किमि कहाँ बखानी। गिरा अनयन नयन बिनु पानी ।।
सुन हरषी सब सखीं सयानी। सिय हियं अति उतकंठा जानी।
एक कहई नृपसुत तेई आली। सुने जो मुनि सँग आए काली।।
ये पुष्पवाटिका का वह प्रसंग है जब एक सखी सीताजी को भगवान श्री राम और लक्ष्मण के प्रथम बार दर्शन कराती है और हर्षित हो कर नृत्य करने लगती है। तथा श्रीराम का प्रथम परिचय देती है। वास्तव में वह सखी कोई अन्य नहीं बल्कि स्वयं हनुमान जी सखी चारुशिला के रूप में सीता जी के साथ पुष्प वाटिका गये थे और माता जानकी को अपने प्रभु राम से मिलवाया था। मूर्तिकार की यही कल्पना
हनुमान जी का शैल विग्रह में मूर्तरूप है।
– #डॉ_हनुमान_मंदिर_दंदरौआधाम_पर_साक्षात्कार-2
#प्रश्न:- महाराज जी, “सखी स्वरूप अर्चाविग्रह” के इतिहास और डॉ हनुमान के नाम से प्रसिद्ध के विषय मे कुछ जानकारी दीजिए?
◆उत्तर:- कुलदीप जी! ऐसी जनश्रुति है कि,राजा, रजवाड़ों के समय दंदरौआ गाँव, राजा धौलपुर (राजस्थान) के आधिपत्य में था। जब राजा यहाँ से जाने लगे तब ग्वालियर के रौरा गाँव के निवासी कुँअर अमृत सिंह (मितबाबा) जो गुर्जर क्षत्रिय वंश के चंदेल राजाओं के वंशज थे, ने इस गाँव को खरीद लिया। इस लिये ये गांव गुर्जर बाहुल्य है। इस गाँव मे श्री हनुमान जी के इस अर्चाविग्रह की दो कहानियां जनश्रुति से सुनने को मिलती हैं। पहली यह की हनुमान जी का सखी विग्रह एक तालाब से मिला था, दूसरी जनश्रुति ये है कि शैल विग्रह किसी नीम के वृक्ष के अन्दर खोखले तने में छिपा था। जब किसी ने निर्माण कार्य के उद्देश्य से इस पेड़ को काटना चाहा तो वृक्ष के काटने के दौरान उसकी आवाज से ऐसा लगा कि खोखले पेड़ के अन्दर कुछ है? और उसी दौरान ग्रामीणों ने श्री हनुमान जी के इस शैल विग्रह को बाहर निकाल कर चबूतरे में रख कर पूजा प्रारम्भ कर दी। लेकिन जैसा कि सभी जानते हैं कि किसी भी देवी-देवता के अर्चाविग्रह की महिमा से लोग तभी परिचित होते हैं, जब कोई साधक या संत अपने तपोबल से उस क्षेत्र को सकारात्मक उर्जा का केंद्र बना देता है। इस स्थान को वो सकारात्मक उर्जा हमारे गुरुमहाराज श्री श्री 1008 महन्त बाबा पुरुषोत्तम दास जी महाराज की तपस्या से प्राप्त हुई है।
#प्रश्न:- महाराज जी! क्या इन्हें लोग सुरू से ही डॉ हनुमान कहते थे?
◆उत्तर:- नहीं, सुरू में “सखी विग्रह”के हमारे श्री हनुमान जी को लोग “खतिया महाबीर” के नाम से पुकारते थे। जब महन्त बाबा श्री पुरुषोत्तम दास महाराज मंदिर के महंत बने, और उन्होंने हवन कुंड की भभूति को लोगों को प्रसाद स्वरूप में देना सुरु किया और पास के ग्रामीण जिन्हें चर्म रोग, फोड़ा फुंसी आदि होते थे, वे यहाँ आते थे, अपनी अर्जी लगाते थे, और भभूति लेकर पाँच मंगलवार या शनिवार परिक्रमा कर ठीक हो जाते थे, तभी से ग्रामीण को लगा कि ये तो “दर्द हरण” करने वाले चिकित्सक हैं, और उनकी आस्था और विश्वास ने इन्हें डॉ. हनुमान नाम दे दिया।
#प्रश्न:- महाराज जी! कुछ विद्वानों का कहना है कि अष्टसिद्धि, नवनिधि के गुणों से पूर्ण हनुमान जी के पहले ‘डॉक्टर’ की उपाधि लगाना उनके व्यक्तित्व को सीमित नहीं कर देता?
◆उत्तर:- कुलदीप जी! ये अच्छा प्रश्न है, जो हमें उनके डॉक्टर उपाधि पर विस्तृत दृष्टिकोण बताने का अवसर देता है। बाल्मीकि रामायण में श्लोक है-
एतस्य बाहुवीर्येण लंका सीता च लक्ष्मणः
प्राप्ताभया जजश्चैव राज्यं मित्राणि बान्धवाः ।
हनुमान यदि में न स्याद, वानराधि पतेः सखा, प्रवृन्तिमपि को वेन्तुं जानक्यः शक्तिमान भवेत।।
(वा. रा.7/35/9-10)
बाल्मीकि रामायण के उक्त श्लोक में कहा गया है कि श्री हनुमान जी के विषय में स्वयं भगवान श्री राम ने ये भाव कृतज्ञता पूर्वक उन्हें स्मरण करते हुए कहे है कि “इन हनुमान के बाहुबल से, मैंने लंका पर विजय प्राप्त की। अपनी प्रिय पत्नी सीता को पुनः प्राप्त किया। मृत्यु सैय्या पर लेटे सहोदर भाई लक्ष्मण को पुनः जीवित रूप में पाया। वानराधिपत सुग्रीव एवं राक्षस श्रेष्ठ विभीषण आदि को मित्र रूप में पाने में तथा पुनः अयोध्या लौट कर राज्य एवं बंधु बांधवों को पाने में समर्थ हुआ। यदि वानरराज सुग्रीव के मित्र हनुमान मेरे सहायक न होते। तो भला प्राण प्रिया जानकी का समाचार जानने में भी कौन समर्थ हो सकता था?
सर्वासु विद्यासु तपोविधाने,
प्रस्पर्धतेऽयं हिं गुरु सुराणा।
सोऽयं नवव्याकरणार्थ वेत्ता,
ब्रह्मा भविष्यत्पति ते प्रसादात ।।
बाल्मीकि रामायण के उक्त श्लोक में कहा गया है कि श्री हनुमान जी के विषय में स्वयं भगवान श्री राम ने ये भाव कृतज्ञता पूर्वक उन्हें स्मरण करते हुए कहे है कि “इन हनुमान के बाहुबल से, मैंने लंका पर विजय प्राप्त की। अपनी प्रिय पत्नी सीता को पुनः प्राप्त किया। मृत्यु सैय्या पर लेटे सहोदर भाई लक्ष्मण को पुनः जीवित रूप में पाया। वानराधिपत सुग्रीव एवं राक्षस श्रेष्ठ विभीषण आदि को मित्र रूप में पाने में तथा पुनः अयोध्या लौट कर राज्य एवं बंधु बांधवों को पाने में समर्थ हुआ। यदि वानरराज सुग्रीव के मित्र हनुमान मेरे सहायक न होते। तो भला प्राण प्रिया जानकी का समाचार जानने में भी कौन समर्थ हो सकता था?
सर्वासु विद्यासु तपोविधाने,
प्रस्पर्धतेऽयं हिं गुरु सुराणा।
सोऽयं नवव्याकरणार्थ वेत्ता,
ब्रह्मा भविष्यत्पति ते प्रसादात ।।
बाल्मीकी रामायण के उक्त श्लोक में कहा गया कि
श्री हनुमान जी के विषय में महर्षि अगस्त्य ने कहा है कि हनुमान जी सम्पूर्ण विद्याओं के ज्ञान तथा तपस्या के अनुष्ठान में ये देवगुरु बृहस्पति की बराबरी करते है। नवीन व्याकरणों के सिद्धान्त को जानने वाले ये हनुमान जी आप की कृपा से अगले कल्प में साक्षात ब्रह्मा होंगे। ऐसे सकलगुण निधान अष्टसिद्धी प्राप्त, नौ निधि के दाता हमारे श्री हनुमान जी, समाज विज्ञान, राजनीति विज्ञान, अर्थशास्त्र, चिकित्सा शास्त्र, धर्म एवं आध्यात्म दर्शन आदि सभी विषयों के विशेषज्ञ है। इसी लिए इन समस्त विषयों में पी.एच. डी. प्राप्त श्री हनुमान जी को भक्ति भाव से “डाक्टर” की उपाधि दी गई है। श्री दैदरौआ धाम, डॉ हनुमान की कृपा से लोगों के विभिन्त्र असाध्य रोगों के निवारण का केन्द्र बन गया है। हम स्वयं उनकी इस चमत्कृत कृपा से आश्चर्य चकित रह जाते है जब श्रद्धालु हमें आकर बताते है कि उसका अमुक असाध्य रोग यहाँ आने मात्र से उनके दर्शन से दूर हो गया।
#प्रश्न:- महाराज जी! दंदरौआ धाम के हनुमान जी का शैल अर्चाविग्रह “सखी स्वरूप”‘ के नृत्य मुद्रा का है। मूर्तिकार के मस्तिष्क में ये कल्पना किस प्रशंग की है?
◆उत्तर:- कुलदीप जी! हमारे हनुमान जी का मुखारबिन्द रमणीक बालिका की तरह आकर्षित करता है, उनके नयन कमल के पत्तों की तरह, और नृत्य करती, मुद्रा श्रृंगार से आक्षादित रहती है। नृत्य मुद्रा में उनका एक हाथ कमर पर तो दूसरा सिर पर है। उनका स्वरूप विग्रह वात्सल्य से भरा है। और उनकी गदा बगल में रखी हुई है। उनके ठीक सामने उनके आराध्य माता सीता, भगवान श्री राम, भाई लक्ष्मण की प्रसन्न चित्त मूर्तियाँ प्रतिष्ठित है। ऐसा लगता है जैसे साक्षात श्री हनुमान जी अपनी माँ जानकी, भगवान राम को देख कर भक्ति भाव से सखी बन कर नृत्य कर रहे है।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरित मानस के बालकांड में पुष्प वाटिका में सीता जी के द्वारा गिरजा (पार्वती) जी की पूजा के प्रसंग में दोहा न. 227 की चौपाई न-4 में लिखा है-
एक सखी सिय संगु बिहाई। गई रही देखन फुलवाई ।। तेहिं दोउ बंधु बिलोके जाई। प्रेम बिबस सीता पहिं आई ।।
कहूँ कारनु निज हरष कर, पूँछहि सब मृदु बैन।।
(बा. 228)
दो.- तासु दसा देखी सखिन्ह, पुलक गात जलु नैन।
चौ- देखन बागु कुँअर दुइ आये। बय किशोर सब भाँति सुहाए।
श्याम गौर किमि कहाँ बखानी। गिरा अनयन नयन बिनु पानी ।।
सुन हरषी सब सखीं सयानी। सिय हियं अति उतकंठा जानी।
एक कहई नृपसुत तेई आली। सुने जो मुनि सँग आए काली।।
ये पुष्पवाटिका का वह प्रसंग है जब एक सखी सीताजी को भगवान श्री राम और लक्ष्मण के प्रथम बार दर्शन कराती है और हर्षित हो कर नृत्य करने लगती है। तथा श्रीराम का प्रथम परिचय देती है। वास्तव में वह सखी कोई अन्य नहीं बल्कि स्वयं हनुमान जी सखी चारुशिला के रूप में सीता जी के साथ पुष्प वाटिका गये थे और माता जानकी को अपने प्रभु राम से मिलवाया था। मूर्तिकार की यही कल्पना
हनुमान जी का शैल विग्रह में मूर्तरूप है।विवेक त्रिपाठी स्टेट हेड चाणक्य न्यूज इंडिया
