अर्थात: गुरु ही ब्रह्मा हैं: जो शिष्य के भीतर ज्ञान का सृजन करते हैं।
गुरु ही विष्णु हैं: जो शिष्य के जीवन और ज्ञान का पालन-पोषण करते हैं।
गुरु ही महेश्वर (शिव) हैं: जो शिष्य के अज्ञान और बुराइयों का संहार करते हैं।
तस्मै श्री गुरवे नमः: ऐसे साक्षात् परब्रह्म स्वरूप गुरु को मेरा कोटि-कोटि नमन।
गुरु गीता की गुरु वंदना की अगली कड़ियाँ में है-
ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामूलं गुरोः पदम्।
मन्त्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा॥
अर्थात:ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः: ध्यान लगाने का मुख्य आधार गुरु का स्वरूप है।
पूजामूलं गुरोः पदम्: पूजा करने का मुख्य स्थान गुरु के चरण हैं।
मन्त्रमूलं गुरोर्वाक्यं: गुरु के मुख से निकला हर वचन एक सिद्ध मंत्र के समान है।
मोक्षमूलं गुरोः कृपा॥: मोक्ष (मुक्ति) प्राप्त करने का एकमात्र जरिया गुरु की कृपा है।
इसी कड़ी में गुरु महिमा का और प्रसिद्ध श्लोक है-
अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
अर्थात: जो मनुष्य अज्ञान रूपी अंधकार में अंधा हो चुका है। गुरु ज्ञान रूपी काजल की सलाई (औषधि) लगाकर उसकी आँखें खोल देते हैं। ऐसे दिव्य दृष्टि देने वाले गुरु को मेरा सादर प्रणाम है।
स्वयं भगवान राम के गुरू विश्वामित्र थे। महाराज जनक के गुरु अष्टावक्र थे, श्री कृष्ण-बलराम गुरु के गोविन्दचार्य थे। स्वामी विवेकानन्द के गुरु रामकृष्ण परमहंस थे। इस प्रकार गुरू परम्परा महापुरुषों की जीवन की एक अनिवार्य प्रणाली रही है। इसी प्रणाली को जीवन्त बनाये रखने हेतु हम इस गुरु पूर्णिमा अवसर पर ‘दंदरौआ धाम विशेषांक’ में धाम के सन्तों में गुरु शिष्य परम्परा पर प्रकाश डालते हुए उनके जीवन के बारे में जानकारी देने जा रहे है।
मध्यप्रदेश के भिंड जिले में स्थित डॉ. हनुमान मंदिर (दंदरौआ धाम) अपनी दिव्य आरोग्य शक्तियों और अद्वितीय गुरु-शिष्य परंपरा के लिए पूरे देश में विख्यात है। इस पवित्र धाम की गुरु-शिष्य परंपरा रामानंदी संप्रदाय की गौरवशाली संतों की श्रृंखला से जुड़ी हुई है, जिसने इस तपोभूमि को आध्यात्मिक और सेवा के सर्वोच्च शिखर पर पहुँचाया है।
इस धाम की मुख्य #गुरुशिष्य_परंपरा_जिन_संतों_के_प्रताप_से_आगे_बढ़ी है उनमें ब्रह्मलीन गुरुबाबा श्री श्री 108 बाबा लछमन दास जी महाराज जो इस परंपरा की नींव हैं इस सिद्ध क्षेत्र के आदि संतों में से एक माने जाते हैं। इन्होंने पिपरसेवा आश्रम (शनिश्चरा ऐतीं के पास) से अपनी साधना का मुख्य केंद्र बनाया और बाद में अपने शिष्य श्री श्री 1008 श्री पुरुषोत्तम दास जी महाराज के ग्राम स्थिति दंदरौआ धाम की भूमि पर कठिन तपस्या की और इस क्षेत्र में आध्यात्मिक चेतना जागृत कर इस गुरु परंपरा की सुदृढ़ नींव रखी।
इनके बाद ब्रह्मलीन महंत बाबा पुरुषोत्तम दास जी महाराज जो बाबा लछमन दास जी के परम योग्य शिष्य थे ने दंदरौआ धाम को अपना मुख्य साधना स्तंभ माना जिनके कालखंड में हनुमान जी के ‘दर्दहरौआ’ (दर्द हरने वाले) सखी वेशधारी स्वरूप की ख्याति दूर-दूर तक फैली। उन्होंने अपने गुरु के आदेशों का पालन करते हुए जनसेवा और भक्ति का प्रसार किया। और वर्तमान में उनके प्रिय शिष्य महंत श्री श्री 1008 महामंडलेश्वर स्वामी रामदास जी महाराज ने डॉ हनुमान मंदिर के आधुनिक स्वरूप को वैश्विक ख्याति दिलाई। बाबा पुरुषोत्तम दास जी के परम शिष्य स्वामी रामदास जी महाराज वर्तमान में इस धाम के पीठाधीश्वर और मुख्य कर्ता-धर्ता हैं।जिनके कुशल नेतृत्व और तपोबल से दंदरौआ धाम को वैश्विक स्तर पर पहचान मिली है। और गत 19 मई 2026 को इनके सानिध्य में इस मंदिर को विश्व का पहला ‘डॉक्टर हनुमान’ और ‘सखी स्वरूप’ मंदिर होने का वर्ल्ड रिकॉर्ड्स इंडिया द्वारा ऐतिहासिक सम्मान भी प्राप्त हुआ है। पूज्य स्वामी रामदास जी महाराज श्योपुर के संतों के साथ-साथ अयोध्या के परम पूज्य श्री श्री 1008 महंत नृत्यगोपालदास जी महाराज की गौरवशाली और वृहद वैष्णव गुरु परंपरा से भी गहराई से जुड़े हुए हैं।
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■ दंदरौआ धाम की गुरु-शिष्य परंपरा की विशेषताएं ★आरोग्य और मंत्र दीक्षा:
इस परंपरा में गुरु अपने शिष्यों को केवल आध्यात्मिक ज्ञान ही नहीं देते, बल्कि लोक-कल्याण के लिए ‘ॐ श्री दंदरौआ हनुमते नमः’ जैसे दिव्य महामंत्र और यज्ञ की भभूति से जन-जन के दुखों का निवारण करना सिखाते हैं।
★सेवा ही परमो धर्म: इस गद्दी की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि यहाँ के प्रत्येक गुरु और शिष्य ने स्वयं को ‘डॉक्टर हनुमान जी महाराज’ का केवल एक सेवक (कंपाउंडर) माना है। यहाँ आने वाले असाध्य रोगियों के लिए लगातार विशाल भंडारे और निःशुल्क आवास की व्यवस्था इसी गुरु परंपरा के सिद्धांतों का हिस्सा है।
